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Hindustan paper editorial (Mangal)
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महिला आरक्षण विधेयक या नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा और राजनीति का तेज होना स्वाभाविक है। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है और इसके लिए गुरूवार से संसद का तीन दिवसीय सत्र शुरू हो रहा है। संसद का यह विशेष सत्र इसलिए ऐतिहासिक होगा, क्योंकि यह विधायी निकायों में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण प्रदान करेगा। इस बड़े बदलाव के तीन कानूनों में संशोधन की जरूरत पड़ रही है। केंद्र में सतारूढ़ गठबंधन के संख्या बल को अगर देखा जाए, तो बदलाव तय लग रहा है। पहले के कानून के अनुसार 33 प्रतिशत महिला आरक्षण अगली जनगणना के बाद लागू होना था लेकिन अब नई जनगणना वाली बाध्यता समाप्त की जा रही है। लक्ष्य यही है कि अगले लोकसभा चुनाव 2029 में महिला आरक्षण लागू हो सके। यह भारतीय राजनीति में एक बहुत बड़ा बदलाव है इससे भारतीय राजनीति का चरित्र भी बदल जाएगा। अतः इस मोड़ पर सियासी सरगर्मी अगर बढ़ गई है तो आश्चर्य नहीं। उŸार भारत में विपक्ष के पास जो दलीलें हैं, वास्तव में उनमें कोई खास दम नहीं है और यह बदलाव संविधान के अनुरूप ही होने जा रहा है। हां एक बार विपक्षी गठबंधन की प्रमुख चिंता पर गौर जरूर करना चाहिए। क्या दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय होने जा रहा है तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने तो इस बदलाव के खिलाफ बिगुल बजा दिया है। वह इसे दक्षिण के राज्यों के साथ सीधे षड्यंत्र बता रहे हैं और इसे रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। वैसे तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं और स्टालिन की उग्रता को समझा जा सकता है। अगर स्टालिन अपनी नाराजगी का सियासी लाभ ले पाए तो महिला आरक्षण के पक्ष में केंद्र सरकार का ताजा अभियान भाजपा और उसके गठबंधन को नुकसान पहुंचा सकता है। वस्तुस्थिति का पता तो बाद में चलेगा लेकिन केंद्र सरकार की ओर से संकेत यह है कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं किया जाएगा।
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