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ग्रामीण कल्याण कार्यक्रम (Mangal)
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भारत एक ग्राम प्रधान देश है। भारत की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के बिना राष्ट्र का विकास असम्भव है। इस कारण गाँवों के समुचित विकास के लिए एवं सरकार की पहुँच को गाँव तक पहुँचाने के लिए भारत सरकार ने विभिन्न प्रकार की कल्याणकारी योजनाएँ चलाई हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य भारत के गाँवों का सामाजिक आर्थिक एवं ढाँचागत विकास करना है ताकि गाँवों में निवास करने वाले लोगों के जीवन में इन योजनाओं के माध्यम से सुधार लाया जा सके। हमारे देश में विभिन्न ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीबी दूर करना है। इसके लिए कोष को अधिक-से-अधिक बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है अपितु बेहतर परिणामों के लिए बुनियादी स्तर पर कुछ परिवर्तन लाना भी अति आवश्यक है। वास्तव में स्वतन्त्रता संग्राम का एक आधार यह था कि ब्रिटिशराज के दौरान ग्रामीण भारत की अनदेखी की जा रही थी। उस समय ग्रामीण कल्याण विकास के लिए की गई प्रगति की गति और उपलब्धियाँ वांछित स्तर की नहीं थी।ग्रामीण विकास को सर्वथा कृषि विकास के साथ जोड़कर देखा गया है और यह मान लिया गया है कि कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि आ जाएगी किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वैचारिक परिवर्तन हुआ। अधिक अन्न उपजाओं जाँच समिति ने केवल कृषि या कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों जैसे- पशुपालन आदि को ही नहीं, अपितु इसके साथ-साथ ग्रामीणों के लिए शिक्षा स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक-आर्थिक जरूरतों के समन्वित कार्यक्रम को भी बढ़ावा दिया। आज देश की एक-तिहाई से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रही है। करोड़ों शिक्षित वर्ग बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं।यद्यपि योजनागत विकास में राष्ट्रीय आय तो बड़ी है किन्तु इस वृद्धि का लाभ लोगों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ है। इसी कारण नई आर्थिक नीतियों पर अमल करने के बाद उन वस्तुओं का ही उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है जो धनी लोगों के काम आती हैं। स्पष्टतः ग्रामीण विकास के बिना हमारा राष्ट्रीय विकास अधूरा एवं निरर्थक ही साबित होगा।
भारत एक ग्राम प्रधान देश है। भारत की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के बिना राष्ट्र का विकास असम्भव है। इस कारण गाँवों के समुचित विकास के लिए एवं सरकार की पहुँच को गाँव तक पहुँचाने के लिए भारत सरकार ने विभिन्न प्रकार की कल्याणकारी योजनाएँ चलाई हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य भारत के गाँवों का सामाजिक आर्थिक एवं ढाँचागत विकास करना है ताकि गाँवों में निवास करने वाले लोगों के जीवन में इन योजनाओं के माध्यम से सुधार लाया जा सके। हमारे देश में विभिन्न ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का उद्देश्य गरीबी दूर करना है। इसके लिए कोष को अधिक-से-अधिक बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है अपितु बेहतर परिणामों के लिए बुनियादी स्तर पर कुछ परिवर्तन लाना भी अति आवश्यक है। वास्तव में स्वतन्त्रता संग्राम का एक आधार यह था कि ब्रिटिशराज के दौरान ग्रामीण भारत की अनदेखी की जा रही थी। उस समय ग्रामीण कल्याण विकास के लिए की गई प्रगति की गति और उपलब्धियाँ वांछित स्तर की नहीं थी।ग्रामीण विकास को सर्वथा कृषि विकास के साथ जोड़कर देखा गया है और यह मान लिया गया है कि कृषि उत्पादन में वृद्धि के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि आ जाएगी किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वैचारिक परिवर्तन हुआ। अधिक अन्न उपजाओं जाँच समिति ने केवल कृषि या कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों जैसे- पशुपालन आदि को ही नहीं, अपितु इसके साथ-साथ ग्रामीणों के लिए शिक्षा स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक-आर्थिक जरूरतों के समन्वित कार्यक्रम को भी बढ़ावा दिया। आज देश की एक-तिहाई से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रही है। करोड़ों शिक्षित वर्ग बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं।यद्यपि योजनागत विकास में राष्ट्रीय आय तो बड़ी है किन्तु इस वृद्धि का लाभ लोगों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ है। इसी कारण नई आर्थिक नीतियों पर अमल करने के बाद उन वस्तुओं का ही उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है जो धनी लोगों के काम आती हैं। स्पष्टतः ग्रामीण विकास के बिना हमारा राष्ट्रीय विकास अधूरा एवं निरर्थक ही साबित होगा।
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